बुधवार, 16 जून 2010

गर्मी

शरीर के अन्दर हड्डियों तक को जलाती गर्मी और ऊपर से यह तपिश फाल्गुन से करीब-करीब भादों तक पुरे विकराल रूप में रहती है.इसी गर्मी में शहरों के घरों में काम करने वाली महरियाँ,घर-घर घूम कर पुरे दिन काम करती हैं और शाम को कोसों दूर अपने घर को जा पाती हैं.इनमे से ज्यादातर महरियाँ अपने घरों की अकेली धन्श्रोत होती हैं.मंहगाई की मार और सामजिक परिवर्तन ने इनकी जिंदगी को और कठिन बना दिया है.पुराने कहानियों में हवेली का महत्वपूर्ण हिस्सा होने वाली यह सर्वहारा वर्ग आज शायद अपने सबसे बुरे दिनों से गुजर रहा है.ज्यादातर शहर से बाहर आस-पास के गाँव से आती हैं और शाम को सारा काम के बाद वापस जाती हैं.इस पूरी प्रक्रिया में इस मौसम की मार ने इनकी कठिनाईयां और बढ़ दी है.उनकी निजी ज़िन्दगी जैसी भी हो कभी कभी अपने जन्म को अभिशाप जरूर समझती हैं , और जन्म दाता को जी भर के गालियाँ जरूर देती होंगी। क्या राम राज्य के समय में भी इनका यही हाल था यह वह रामराज्य केवल किताबों की काल्पनिक कहानियां हैं.

2 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहा आपने इनके त्रासद जीवन का कहीं अन्त नहीं है..वर्तमान वैश्वीकरण व स्व के दायरे में कैद होते मानव के लिए पर की पीङा बेमानी हो गई है हमारे आसपास यदि हम आँखे खोलकर देखे तो जाने कितनी सिसकती जिन्दगियां मिलेगी....अच्छी रचना हेतु शुभकामनाएं।

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  2. आपकी बात सही है । हम यही कर सकते हैं कि इनके पैसे ना काटें । छुट्टी की जरूरत हो तो बिना ना नुकुर किये दें । ठंडा पानी शरबत पूछें ।

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