शनिवार, 25 अप्रैल 2026

राहरौ ही था ,एक  खाली से सफ़र का ,
आहट सुनी ,देखा  कोई और भी है,

संगिनी ! ये जज्बातों का ताना-बाना नहीं है ,
यह एक मुसल्सल कहानी है,जिंदगी की

आसमां में सुराख का  जज्बा  भी नहीं
गंगा  को खींचने की जूनून भी नहीं

छोटी-छोटी  हसरतों और उमंगों की क्यारियां
एक मुट्ठी आसमां ,और पांव फ़ैलाने को जमीन

साथ चलने की कोई शर्त ना थी
बस साथ चलते रहे ,कुर्बती सहेजते रहे

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