शूकर ब्यथा
चहुँ ओर निहारता चकित वह ,
कैसी यह दुनिया ,कैसा यह देश ,
स्वछंद रहा मैं जहाँ आज तक
कैसा यह बंधन कैसा यह द्वेष ,
मानव संग थी यारी अपनी ,
नहीं हुई थी रारी भी अपनी ,
गली - गली में ऎसे घूमा
राजपुरोहित लगता मैं जैसे
भूख लगी तो आलस कैसी
भरा पड़ा है कूड़ा रास्ते
नींद लगी तो इन कचड़ो में
सपने आते बहुत सुहाने
भरा - पूरा परिवार हमारा
इन कचड़ों में पलता बढ़ता
मैं, स्वयं, मेरे दर्ज़न बच्चे
जीवन यापन करते थे सस्ते
कौन आया यह मोदी प्राणी
जीना दूभर कर रहा हमारा
स्वच्छता का राग अलापा
हम सब का मन -प्राण उडाता
मानव के संग फूट कराया
आँखों की किरकिरी बनाया
बच्चे मेरे रहे बिलखते
रास्ते से कूड़ा हटवाया
बिन कचड़ों के जीना कैसा
जीवन जैसे मरने जैसा
मानव देखो कितना खुश है
चेहरे पर एक नयी चमक है ,
घर संवारा ,शहर संवरा ,
जीने की एक नयी ललक है
शंखनाद बज़ उठा हर ओर है
यह अभियान नहीं एक संकल्प है
नाम : शंकर कुमार झा
चहुँ ओर निहारता चकित वह ,
कैसी यह दुनिया ,कैसा यह देश ,
स्वछंद रहा मैं जहाँ आज तक
कैसा यह बंधन कैसा यह द्वेष ,
मानव संग थी यारी अपनी ,
नहीं हुई थी रारी भी अपनी ,
गली - गली में ऎसे घूमा
राजपुरोहित लगता मैं जैसे
भूख लगी तो आलस कैसी
भरा पड़ा है कूड़ा रास्ते
नींद लगी तो इन कचड़ो में
सपने आते बहुत सुहाने
भरा - पूरा परिवार हमारा
इन कचड़ों में पलता बढ़ता
मैं, स्वयं, मेरे दर्ज़न बच्चे
जीवन यापन करते थे सस्ते
कौन आया यह मोदी प्राणी
जीना दूभर कर रहा हमारा
स्वच्छता का राग अलापा
हम सब का मन -प्राण उडाता
मानव के संग फूट कराया
आँखों की किरकिरी बनाया
बच्चे मेरे रहे बिलखते
रास्ते से कूड़ा हटवाया
बिन कचड़ों के जीना कैसा
जीवन जैसे मरने जैसा
मानव देखो कितना खुश है
चेहरे पर एक नयी चमक है ,
घर संवारा ,शहर संवरा ,
जीने की एक नयी ललक है
शंखनाद बज़ उठा हर ओर है
यह अभियान नहीं एक संकल्प है
नाम : शंकर कुमार झा
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