शनिवार, 25 अप्रैल 2026

फुलचनमा के माए मैर गेलई
न चाँद कनलै , न तरेगण कनलै

कनलै के , आ त छहर परहक कुजरनी कनलै

सिंहसरा के बेटा मरि  गेलै
न आँगन कनलै ,न  बहरी कनलै

कनलै के , आ त टीशन  परहक मुसहरनी  कनलै

ऐना  कियाक  भेलै , अपन  कियो  ???

अपनों  सब  कनलै , मुदा  देखा  के  कनलै
जेकरा  जे  उम्मीद , हिसाब  से  कनलै

जे आन कनलै  से  दुःख  से  कनलै
ने  उम्मीद  लेल , ने  देखा  के कनलै

अप्पन   में , सबसँ  बेसी  कनला   लत्तों  बाबू
हुनका  सप्ताह  भरि  के  ग्रास  भेंट  गेलैन

हँ  ! एक  गोटे  और  खूब  कनलक
परशु  झा ;भोकाइर्  पाइर  के कनला

सूद देत  नहि ,त  ज़मीन  त  देत
व्यवस्था अपन  हाथ  में लेलनि परशु

आगू की , आगू आब ब्राह्मण भोजन होएत
मांस आ माछ सहित नीक सचार लागत 

ज़मीन भरना लागत , बर्तन बासन आर गोदान होएत
तकर बाद ? तक़र बाद की ,भगवान निसाफ करथिन




  
राहरौ ही था ,एक  खाली से सफ़र का ,
आहट सुनी ,देखा  कोई और भी है,

संगिनी ! ये जज्बातों का ताना-बाना नहीं है ,
यह एक मुसल्सल कहानी है,जिंदगी की

आसमां में सुराख का  जज्बा  भी नहीं
गंगा  को खींचने की जूनून भी नहीं

छोटी-छोटी  हसरतों और उमंगों की क्यारियां
एक मुट्ठी आसमां ,और पांव फ़ैलाने को जमीन

साथ चलने की कोई शर्त ना थी
बस साथ चलते रहे ,कुर्बती सहेजते रहे
आऊ सब मिल के शोक मनाबी
आऊ सब मिल के मौन राखी

परिवार के विध्वंश के ,समाज के  विखंडन के
गामक तिरस्कार के , शहर लेल टपकैत लेर के

फुसियाही के आधुनिकता के ,देखौव्वल के अहंकार के
पाई के ग़ुलामी के , शिक्षा के बंध्याकरण के

परंपरा के मृत्यु पर , पाश्चात्य के यौवन पर
गायत्री के कारावास पर, उच्छृंखलता के अभयदान पर

राम  के  " रामा " पर , शिव  के  "शिवा" पर
बौआ के "बेबी " पर ,स्वामी के "हनी" पर


विवाह  के धकियेनाइ  पर , लिव - इन्  के स्वागत पर
नाटक के इह -लीला पर , नाच  के  स्वागतम  पर

आँगन  के गैलरी  पर , दालान के बालकनी  पर
बहरी  के  सिमैटि  के  आँगन  में घोसिएनाई  पर    


गुरुवार, 6 जुलाई 2023

तसव्वुर  तो थी कभी ,मगर सच होगा ,
ज़िन्दगी तू ऐसे भी कभी reboot होगा
अफ़साने तो सुने ,मगर ये हकीकत होगा 
ज़िन्दगी तू इस तरह से भी दिलफ़रेब होगा 
चल रहा था अपनी ही धुन में ज़माना ,
और ये ही शायद  तुम्हें नागवार होगा 
बदहवास भागते मासरे इस सफर में 
उनकी ये डोर फिर तुम्हारे हाथ होगा 
 भूख की ये  ज़िद्द और सफर धूप की 
किसे  मालूम तू इस तरह बेवफा होगा 
कभी तो सोचता ,इस फूल से पांवों में 
पाजेब  तो नहीं ,ये जख्म के निशाँ होंगे 

निहार के  सो गयी होगी वो मां के आँखे 
ये उम्र का असर नहीं ,इंतज़ार की इंतेहा होगी प

समेट ली कुछ ज़िन्दगी तुमने
फैला दिया कुछ बेबसी की चादरें
ऐसा तो नहीं ,तू इस तरह बेमुर्रवत होगा

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

कलयुगी

निशा के कोख मे लिखी गयी
घृणित,रक्त रंजित कहानी फिर से
एक और निर्भया के शोणित से
कलन्कित हुई धरा का वक्ष फिर से
फिर वही वाचालता, फिर वही शोर
दुहराया जायेगा मनुष्य की अमनुष्यता फिर से
सुना था कलियुग है,कोई कृष्ण नही, कोई भीष्म नहीं,
दुर्योधन और दुस्सासन करेंगे चीत्कार फिर से
मूक बनकर देखना तुम ,शर्म से आँखें झुकाकर
घूंट ये पीना पड़ेगा अपमान का इस बार फिर से
#RIPPRIYANKA

रविवार, 27 अप्रैल 2014


यौ  बाबू
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बहि त गेल छी जिंदगी में ,मुदा घुरब कोना
कमला त सदैव बहैत रहती,मुदा देखब कोना

 इ बेंटली ,इ ऑडी ,इ मोनोरेल  त  भेटत
मुदा उजरा  बरद के घंटी सुनब कोना

रैडिसन ,लीला ,हिलटन  में सब किछु भेटत
मुदा  दाई  के हाथ  के बगिया भेटत कोना

 श्रेया , सुनिधि ,मीका  त  सब  किछु  सुनाओत
मुदा  महिसवार   के  गीत  सुनब  कोना


एस्सेलवर्ल्ड ,फन्तासीलैंड ,मजिक्टौन  त  घूमब
मुदा  लतामक  गाछ  पर  चढ़ब  कोना

अंकल , आंटी ,दादाजी ,दादीजी  सब  मुस्कुराएत
मुदा  काका  के  बिगड़ाई  सुनब  कोना

करीना , दीपिका , आलिया ,हेमा  सब  के  देखब
मुदा  घोघ  में  नुकाएल  भौजी  देखब  कोना

कोकाकोला , ठंडाई  , शराब  , बियर  सबटा  भेटत
मुदा  काकीमौसी  के  हाथक  बेलक  शरबत भेटत  कोना

प्रॉन , पैम्फलेट, आर आंध्रा ता खूब खाइत छी
मुदा  पोखैर महक कवई  भेटत  कोना

एसी ,कूलर ,फ्रिज  त  खूब  ठंडा राखत
मुदा पछवा  हवा  के झोंक  भेटत कोना

बाउ  यौ  ! संखमरमर  त  देने छियै  घर में
मुदा  पुबरिया  घरक माटिक सुगंध भेटत कोना

निगमबोध घाट  त  भेट  जाएत
मुदा  बाबाक  सारा  कात  में  सुतब  कोना


एस के झा 

सोमवार, 26 अगस्त 2013

चांदनी बेगम

बदरंग सी दोपहर ठहरा हुआ सा दिन
एकाकी जीवन में थकता हुआ  सा मन

सुबह की हलचल ,रुकता हुआ सा दिन
अलसाई जीवन में थकता हुआ सा मन

क्षण क्षण प्रतिक्षण धूमिल होता दृष्टिकोण
समय के प्रहार से टूटता हुआ सा मन

पूस की रात,फागुन के रंग अभी-अभी ,चैत के दिन
सावन के बाद अब तक  ,तरसा हुआ सा मन

भयावह रात की स्मृति धूमिल करते दिन
दिवस की अवहेलना ,प्रण करता हुआ सा  मन

सास बहु के शोर से अच्छी हैदर की कलम
उसाँसे भरी जीवन में थकता हुआ सा मन'

चलो "हैदर" ने  फ़िर से स्वप्निल  किया है दिन
 चांदनी बेगम की लकीरों से खुलता हुआ सा दिन