शनिवार, 28 अगस्त 2010

निःशब्द


सांझ सवेरे हवेली की देहरी पर बाट जोहती माँ,
अपने ही जाये की आस में राह जोहती माँ,

अपने आप पर अबिस्वास की लकीर खींचती माँ,
ज़िन्दगी से हारी लगती है यह अपनी माँ,

कितना छोटा था वह जब जन्म दिया था उसको
लगता नहीं की अब कभी ,फिर पाउंगी उसको

अपनी नन्ही हाथों में चावल की बगिया लिये
मिटटी में खेलता रहता गिलास में पानी लिये,

माँ की लोरी सुन कर वह खो जाता था सपनो ,में ,
माँ और चंदा मामा ही थे उसके अपनों में,

उसका सुख ही अपना सुख था,उसका दुःख ही माँ का दुःख
उसकी आँखों से हंसती थी वह और उसकी ही आँखों से rothi



सब कुछ गँवा दिया माँ ने हंसी सहेजकर उसकी
और क्या बांकी रहा था झोली में उसकी

गया था जब से वह अपने माँ से दूर
सुध न ली थी उसने, उस जननी को भूल

बैधाव्य से श्रापित वह करती थी आस
अब किन्तु विधाता से ही उसकी आस,

एक दिन पड़ी मिली वह ,देहरी के बहार ,हाथ में चिट्ठी फँसी थी
ankhen खुली थी आस में
aayega nahin wah अब कभी लौट के उसके पास बहती नहीं अब माँ का साथ

सब झूठ लिखा मुन्नवर राणा न
"जी करता है फिर से फरिश्ता बन जाऊं,
माँ से इतना लिपट जाऊं की बच्चा बन जाऊं"
















1 टिप्पणी:

  1. सांझ सवेरे हवेली की देहरी पर बाट जोहती माँ,
    अपने ही जाये की आस में राह जोहती माँ,

    अपने आप पर अबिस्वास की लकीर खींचती माँ,
    ज़िन्दगी से हारी लगती है यह अपनी माँ,

    बढ़िया रचना प्रस्तुति.....

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