शनिवार, 25 अप्रैल 2026

शूकर ब्यथा
चहुँ ओर निहारता चकित वह ,
 कैसी यह दुनिया ,कैसा यह देश ,

स्वछंद रहा  मैं जहाँ आज तक
कैसा यह बंधन कैसा यह द्वेष ,


मानव संग थी यारी अपनी ,
नहीं हुई थी रारी भी अपनी ,

गली - गली में ऎसे घूमा
राजपुरोहित लगता मैं जैसे

भूख लगी तो आलस कैसी
भरा पड़ा है कूड़ा रास्ते

नींद लगी तो इन कचड़ो में
सपने आते बहुत सुहाने

भरा - पूरा परिवार हमारा
इन कचड़ों में पलता बढ़ता

मैं, स्वयं, मेरे दर्ज़न बच्चे
जीवन यापन करते थे सस्ते
कौन आया   यह मोदी प्राणी
जीना दूभर कर रहा हमारा

स्वच्छता का राग अलापा
हम सब का मन -प्राण उडाता

मानव के संग फूट कराया
आँखों की किरकिरी बनाया

बच्चे मेरे रहे बिलखते
रास्ते से कूड़ा हटवाया

बिन कचड़ों के जीना कैसा
जीवन जैसे मरने जैसा

मानव देखो कितना खुश है
चेहरे पर एक नयी चमक है ,

घर संवारा ,शहर संवरा ,
जीने की एक नयी ललक  है

शंखनाद बज़ उठा हर ओर है
यह अभियान नहीं एक संकल्प है 

नाम : शंकर कुमार झा

फुलचनमा के माए मैर गेलई
न चाँद कनलै , न तरेगण कनलै

कनलै के , आ त छहर परहक कुजरनी कनलै

सिंहसरा के बेटा मरि  गेलै
न आँगन कनलै ,न  बहरी कनलै

कनलै के , आ त टीशन  परहक मुसहरनी  कनलै

ऐना  कियाक  भेलै , अपन  कियो  ???

अपनों  सब  कनलै , मुदा  देखा  के  कनलै
जेकरा  जे  उम्मीद , हिसाब  से  कनलै

जे आन कनलै  से  दुःख  से  कनलै
ने  उम्मीद  लेल , ने  देखा  के कनलै

अप्पन   में , सबसँ  बेसी  कनला   लत्तों  बाबू
हुनका  सप्ताह  भरि  के  ग्रास  भेंट  गेलैन

हँ  ! एक  गोटे  और  खूब  कनलक
परशु  झा ;भोकाइर्  पाइर  के कनला

सूद देत  नहि ,त  ज़मीन  त  देत
व्यवस्था अपन  हाथ  में लेलनि परशु

आगू की , आगू आब ब्राह्मण भोजन होएत
मांस आ माछ सहित नीक सचार लागत 

ज़मीन भरना लागत , बर्तन बासन आर गोदान होएत
तकर बाद ? तक़र बाद की ,भगवान निसाफ करथिन




  
राहरौ ही था ,एक  खाली से सफ़र का ,
आहट सुनी ,देखा  कोई और भी है,

संगिनी ! ये जज्बातों का ताना-बाना नहीं है ,
यह एक मुसल्सल कहानी है,जिंदगी की

आसमां में सुराख का  जज्बा  भी नहीं
गंगा  को खींचने की जूनून भी नहीं

छोटी-छोटी  हसरतों और उमंगों की क्यारियां
एक मुट्ठी आसमां ,और पांव फ़ैलाने को जमीन

साथ चलने की कोई शर्त ना थी
बस साथ चलते रहे ,कुर्बती सहेजते रहे
आऊ सब मिल के शोक मनाबी
आऊ सब मिल के मौन राखी

परिवार के विध्वंश के ,समाज के  विखंडन के
गामक तिरस्कार के , शहर लेल टपकैत लेर के

फुसियाही के आधुनिकता के ,देखौव्वल के अहंकार के
पाई के ग़ुलामी के , शिक्षा के बंध्याकरण के

परंपरा के मृत्यु पर , पाश्चात्य के यौवन पर
गायत्री के कारावास पर, उच्छृंखलता के अभयदान पर

राम  के  " रामा " पर , शिव  के  "शिवा" पर
बौआ के "बेबी " पर ,स्वामी के "हनी" पर


विवाह  के धकियेनाइ  पर , लिव - इन्  के स्वागत पर
नाटक के इह -लीला पर , नाच  के  स्वागतम  पर

आँगन  के गैलरी  पर , दालान के बालकनी  पर
बहरी  के  सिमैटि  के  आँगन  में घोसिएनाई  पर    


गुरुवार, 6 जुलाई 2023

तसव्वुर  तो थी कभी ,मगर सच होगा ,
ज़िन्दगी तू ऐसे भी कभी reboot होगा
अफ़साने तो सुने ,मगर ये हकीकत होगा 
ज़िन्दगी तू इस तरह से भी दिलफ़रेब होगा 
चल रहा था अपनी ही धुन में ज़माना ,
और ये ही शायद  तुम्हें नागवार होगा 
बदहवास भागते मासरे इस सफर में 
उनकी ये डोर फिर तुम्हारे हाथ होगा 
 भूख की ये  ज़िद्द और सफर धूप की 
किसे  मालूम तू इस तरह बेवफा होगा 
कभी तो सोचता ,इस फूल से पांवों में 
पाजेब  तो नहीं ,ये जख्म के निशाँ होंगे 

निहार के  सो गयी होगी वो मां के आँखे 
ये उम्र का असर नहीं ,इंतज़ार की इंतेहा होगी प

समेट ली कुछ ज़िन्दगी तुमने
फैला दिया कुछ बेबसी की चादरें
ऐसा तो नहीं ,तू इस तरह बेमुर्रवत होगा

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

कलयुगी

निशा के कोख मे लिखी गयी
घृणित,रक्त रंजित कहानी फिर से
एक और निर्भया के शोणित से
कलन्कित हुई धरा का वक्ष फिर से
फिर वही वाचालता, फिर वही शोर
दुहराया जायेगा मनुष्य की अमनुष्यता फिर से
सुना था कलियुग है,कोई कृष्ण नही, कोई भीष्म नहीं,
दुर्योधन और दुस्सासन करेंगे चीत्कार फिर से
मूक बनकर देखना तुम ,शर्म से आँखें झुकाकर
घूंट ये पीना पड़ेगा अपमान का इस बार फिर से
#RIPPRIYANKA

रविवार, 27 अप्रैल 2014


यौ  बाबू
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बहि त गेल छी जिंदगी में ,मुदा घुरब कोना
कमला त सदैव बहैत रहती,मुदा देखब कोना

 इ बेंटली ,इ ऑडी ,इ मोनोरेल  त  भेटत
मुदा उजरा  बरद के घंटी सुनब कोना

रैडिसन ,लीला ,हिलटन  में सब किछु भेटत
मुदा  दाई  के हाथ  के बगिया भेटत कोना

 श्रेया , सुनिधि ,मीका  त  सब  किछु  सुनाओत
मुदा  महिसवार   के  गीत  सुनब  कोना


एस्सेलवर्ल्ड ,फन्तासीलैंड ,मजिक्टौन  त  घूमब
मुदा  लतामक  गाछ  पर  चढ़ब  कोना

अंकल , आंटी ,दादाजी ,दादीजी  सब  मुस्कुराएत
मुदा  काका  के  बिगड़ाई  सुनब  कोना

करीना , दीपिका , आलिया ,हेमा  सब  के  देखब
मुदा  घोघ  में  नुकाएल  भौजी  देखब  कोना

कोकाकोला , ठंडाई  , शराब  , बियर  सबटा  भेटत
मुदा  काकीमौसी  के  हाथक  बेलक  शरबत भेटत  कोना

प्रॉन , पैम्फलेट, आर आंध्रा ता खूब खाइत छी
मुदा  पोखैर महक कवई  भेटत  कोना

एसी ,कूलर ,फ्रिज  त  खूब  ठंडा राखत
मुदा पछवा  हवा  के झोंक  भेटत कोना

बाउ  यौ  ! संखमरमर  त  देने छियै  घर में
मुदा  पुबरिया  घरक माटिक सुगंध भेटत कोना

निगमबोध घाट  त  भेट  जाएत
मुदा  बाबाक  सारा  कात  में  सुतब  कोना


एस के झा 

सोमवार, 26 अगस्त 2013

चांदनी बेगम

बदरंग सी दोपहर ठहरा हुआ सा दिन
एकाकी जीवन में थकता हुआ  सा मन

सुबह की हलचल ,रुकता हुआ सा दिन
अलसाई जीवन में थकता हुआ सा मन

क्षण क्षण प्रतिक्षण धूमिल होता दृष्टिकोण
समय के प्रहार से टूटता हुआ सा मन

पूस की रात,फागुन के रंग अभी-अभी ,चैत के दिन
सावन के बाद अब तक  ,तरसा हुआ सा मन

भयावह रात की स्मृति धूमिल करते दिन
दिवस की अवहेलना ,प्रण करता हुआ सा  मन

सास बहु के शोर से अच्छी हैदर की कलम
उसाँसे भरी जीवन में थकता हुआ सा मन'

चलो "हैदर" ने  फ़िर से स्वप्निल  किया है दिन
 चांदनी बेगम की लकीरों से खुलता हुआ सा दिन



 















गुरुवार, 25 जुलाई 2013

मेरी बिटिया जो आज से कॉलेज जाने लगी

है कोई बात जो , आज करा रही एहसास
फलसफा है या है एक नयी जिंदगी की शुरुआत !

जूते के फीते बांधे ,बैग लिया ,कपड़ों  को  निहारा
माँ को बाय कहा  ,और  तेज़ी से निकल गयी

एक  नयी ऊँचाई   पर नया क्षितिज बनाने
इस नए क्षितिज पर नया सपना संजोने

शुरुआत की कुछ कच्चे पक्के एहसासात होंगे
इन एहसासों की नीव पर कुछ ज़िन्दगी के उसूल होंगे

इन उसूलों पर  चलके चाँद छूने की जिद होगी
फूल सी जान को कांटो पर चलने की शब्  होगी

हर एक शुबह एक नयी मंजिल होगी
फिर शाम ढले मंजिल को छूने  का शबब होगा

इन  मंजिलों के बाद चाँद पर उसका इख्तियार होगा
फिर चाँद होगा सितारों की बारिश में पाँव के नीचे जमीं होगा

फिर  तेरी ऊंचाइयों के चर्चे मेरी जुबान पर होगा
और माँ तेरी खामोश रहकर हर पत्थर की सजदा  करेगी 



एस . के .झा






शुक्रवार, 26 अप्रैल 2013

"मेरी बदजुबानी से कैसा तूफां उमड़ आया
फिर आँखों से तेरी आंसू का सैलाब उमड़ आया ,

कहना था कुछ , कह कुछ मैं और आया
या अल्लाह ! यह तीर फिर तेरे दिल को चीर आया ,

शौक़ था ,तेरी ख़ुशी लाने मैं बाज़ार गया
ख्वामखाह ,मैं फूल समझ कांटे उठा लाया ,

रोशन हो तेरी राह ., यह सोचकर मैं शमा जला  आया
मुड़ के देखा ,यह क्या ,मैं आग का दरिया बहा आया ,

बुलंद करने तेरे सितारों को मै आसमां झुका  लाया
ऊफ्फ ! यह क्या ,मैं खुद अपना कफ़न ओढ़ आया

आबाद तेरा गुलशन रहे ,यह मेरी इबादत "सुमन"
यह अलग बात है ,तेरी बेरुखी का इलज़ाम मिरे सिर आया !!

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

इंतज़ार

इस बार छुट्टि
यों में गाँव जरूर जाना
माँ से मिलना बाबा से आशीष   लेना

सुना है बेटी अब कॉलेज जाने लगी
बेटा  भी सुना अब जिम्मेवार हो गया है

अब तो इस बार  जा ही  ही सकते  हो
जरूर जाना , इस बार गाँव,जरूर आना
, सुना है ,माँ के आँखों की रौशनी कम गयी है
बाबा भी अब चल फिर नहीं पाते

माँ से मिलना, उनकी सुनना, अपनी सुनाना
बाबा से भी मिलना ,भरोसा दिलाना

सुना है ,तिरे शहर में रातों को उजाला रहता है
गाँव जाना,रातों में ,जुगनुओं को जरूर बताना

सुना है क़त्ले आम अब तिरे शहर में आम हो गया
गाँव जाना ,भूल कर भी  मगर यह  जिक्र न करना

सुना है तिरे शहर  में रिश्ते भी लहूलुहान हो गए
बड़ों से मिलना और अपने होने का एहसास दिलाना

सुना है ओस की बूंदे चुनते चुनते देर हो गयी
गाँव जाना ,नदी के किनारों से मुआफी माँगना

गाँव जाना शाम को आसमां से बातें करना
शहर की रफ़्तार को कोसना और उससे सकून उधार लेना

हाँ ,महंगी न  सही ,कुछ टॉफियाँ जरूर ले लेना
बच्चों  को  बुलाना ,उन्हें देना ,उनकी खुशियाँ पढ़ना

एस . के .झा

रविवार, 6 जनवरी 2013

झुक गया फिर एक बार शर्म से मेरे नयन
हो गया उसके लहू से शर्मशार फिर यह गगन

है क्षितिज में चन्हुओर यह ममता का आर्त नाद
झुक गयी है धरतीं देख फैलता यह करुण  क्रांत 

है किसका यह  दोष् मोहन कब लोगे अवतार फिर
कब  होगा सुरक्षित अब  द्रौपदी का चीर फिर

एक ध्रितराष्ट्र के लिए तुमने रचा वह  घोर युद्ध
उकसा रहा है फिर तुम्हे  फिर से रचो वह घोर युद्ध


कांपती है यह धरा अब अपने ही आंसुओं के भार से
जीर्ण विदीर्ण पड़ी है वह लाल होकर अपने लहू से

होगा पतन  कुछ इस तरह   से  सोच सकता है न कोई
 गार्त होगा कुछ इस तरह से सोच सकता है न कोई

लेकिन चली अब ऐसी हवा है दुशाशन की अब ख़ैर नहीं
दुर्गा ने अब लिया मोर्चा रक्तबीज की अब खैर नहीं

"निर्भया" होकर लड़ी वह ज़िन्दगी से जूझती
मौत था स्तब्ध खड़ा और ज़िन्दगी भी झांकती

वक़्त भी थम सा गया था देश भी रुक सा गया था
हर लबों पर नाम था बस एक अकेली "दामिनी"

गली नुक्कड़ से लेकर क़ुतुब के मीनार तक
रो पड़े थे नाम लेकर तेरा "दामिनी "

हम सबने संकल्प लिया है तलवार लेकर हाथों में
छीनकर ही लौटेंगे अब खुशहाली  तुम्हारी हाथों में

तुम भी चलो ,हम भी चलें लेकर मशाल इन हाथों में
अब नहीं होगा कभी फिर ऐसा अँधेरा रातों में








सोमवार, 12 नवंबर 2012

एक दीपक

टिमटिमाती जा रही यह दिए की लौ देखो
बिखरता जा रहा है यह अँधेरा यार दखो

है अकेला किन्तु जोश कितना इसमें देखो
हार कर चला अँधेरा अब सिमटता यार देखो

जब तक रहेगा प्राण शक्ति तब तक यह लड़ता रहेगा
क्षीण होती ही रहेगी तम का अब प्राण देखो

रात भर जलती रहेगी चन्द्र के अवसान तक यह
एक केवल सूरज के तड़प  में दिवस के आह्वान तक यह

सूर्य की जब लालिमा ने छू लिया इसके रगों को
कर दिया इसने विसर्जित अपना यह मन प्राण देखो

है तिमिर की यह कालसर्प चन्हूओर बिखरी
उसमे अकेला प्रकाश की यह दरबार देखो

लहर उठेगी एक दिन जब इसकी विजय पताका
हर तरफ होगा उजाला प्रेम का है पर्व देखो

हम रहें न तुम रहो लेकिन युगों  तक इसकी रहेगी उम्र देखो
रहा था ,रहा है,और रहेगा तम समर का यह सतत वीर देखो


-एस के झा

गुरुवार, 1 मार्च 2012

अहाँ के नाम


बहुत दिन भ गिल
मोन    लागल  अछि
ने    कोनो   चिट्ठी   ने   पत्री
ने फोने ने समाद
कोनो   समाचार नहि
गोसाविन  घर में बैस के
बाट  तकैत    छी
हम त एस्कर भ गेलहुं
फगुआ में  सबहक अबैया   छै
अहाँ टा के कोनो खबर नहि
रंग अबीर स डर होइत  अछि
मोन सशंकित भेल अछि
लोकक दृष्टि से बदलि  गेली
हम त एस्कर भ गेलहुं


गेरुआ खोल  पर जे गुलाबक फूल छल
तकर रंग उडि गेल
अहाँक नाम बला जे रुमाल छल
से फाईट गेल
जट्टा - जट्टिन से बदरंग भ गेल
कनिया पुतरा सब बेकार भ गेल
ख़ुशी त मानु अतीत   भ गेल
हम त एस्कर भ गेलहुं

आँगन में जे जोड़ा गुलाब छल से मुरझा गेल
भनसा ओसारा पर जे सुग्गा छल से कतहु   चल   गेल
पछुआर बाला बच्चा सभ आब नहि अबैत छथि
एकाकी में जीवन के अभिशाप भोगित छि
हम त एस्कर भ गेलहुं

बलान के कछार पर जे नाम लिखने रही
 से मिटा  गेल
होइत छल जे ओ ताजमहल जकां रहत
मुदा ओ त पाइन से मिटा गेल
हम त एस्कर भ गेलहुं


गामक    जरदालू  गाछ
पर लिखल नाम मुदा औखन अछि
ओकरा   पाइन बिहारि नहि मिटा सकलहि
एही अवलंब अछि
अहाँ आएब आर जरूर आएब

इति






मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

घुरि आऊ गाम

ठाड़ छी  घरक पछुआर  में
बस्बिट्टी लग
बांस  आब नै,खाली जमीन छै,
दूर देखैत छि कलम बाग़
 सेहो   आब कम भ गैलाई
 खाली घर सब देखि रहल छि
घरक कात  से    
आवाज़ आयेल,बसंता हर ल
के जाईत ऐछ .
मुदा नहि
ई भ्रम छल
बसंता आब गाम में नहि
रहैत ऐछ,अलीगढ गेल अछी कमाई लेल
आब गाम में हर नहि चलैत छैक
ट्रक्टर चलैत छैक
खलिहान दिस गेलौं
लागल जेना गामक किछु काका
लोकिन एलाह अछि
मुदा खाट त  ख़ाली पडल अछि 
खलिहान दिस सेहो क्यों नहि
ख़ाली खलिहान,खाली दरवाज़ा
अचानक स्तब्ध भ
ठाड़ भ गेलहुं
की हम गाम में छि
या कतहु परदेस में
आब खेत में बाबा मेघडम्बर
ल के खेतक आइर
पर नहीं रहित छैथ   
आब गाम में आँगन में हुड दंग नहि
 नेन्ना भुटका के
 गाम में अन्हरिया राईत  में
भगजोगनी नहीं पकडैत छैक
नेन्ना भुटका सब 
आब क्यों काका काकी ,बाबा बाबी 
खिस्सा नहि सुनबैत छैक
नेन्ना भुटका के
आब गाम में दर्द नहीं छैक अनका लेल
आब गाम में सिनेमा हॉल छैक
आब गाम में शीशा बाला दुकान
आब  गाम में शराबक भट्ठी सेहो छैक 
अचानक  दाई शोर पारै छैथ
घुरि आऊ बाऊ यौ
क्यों नहि भेटत आब 
गाम आब किदन भ गेले


गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

बसंत

कब आयेगा बसंत  रे सखी
कब होंगे मेरे पात हरे
कब आयेंगे पंछी तरु पर
कब होंगे मेरे साथ सखे

अवरोध   बना खड़ा मैं झांकता 
उस असीम को अपलक निहारता
जिस आँचल में खग ब्रिंद भागते
थकते तो मुझमे चुप जाते,

कभी खोजता उस पथिक को
जिसने अपनी रैन बितायी
ऐसा क्या है मैं इतनी परायी
कभी  न कोई मेरी   सुध ही लेता

नितांत अकेला खड़ा स्तब्ध मैं\
सूरज की गर्मी में तपता
पतझड़ की ये  हवा के झोंके
हर क्षण ,हर पल,भय दिखाता

परित्यक्त पड़ा मैं अपने घर में
एकाकी के क्षण को गिनता
राहगीर की बैमनास्यता
मेरे दिल की घाव बढ़ाते

यह दुःख भी क्षण भंगुर सखी री
जीवन  फिर  होगी खुशहाल
नयी टहनियों पर फिर फुद्केंगे
छोटे चुलबुल चोंच चकोर
हरे ड़ाल पर, हरे पात पर नव जीवन का संचार


















मंगलवार, 15 मार्च 2011

सानिध्य से अवकाश

लो आ ही गया वह क्षण प्रिये,

अपने लम्बे सानिध्य से अवकाश प्रिये,

कुछ जीवन की आवश्यकता ,

कुछ कर्त्तव्य का बोध, अस्वीकार्य किन्तु अपरिहार्य प्रिये।

अपने लम्बे सानिध्य से अवकाश प्रिये,

जीवन के इस कठिन मोड़ पर ,

हर निर्णय है एक परिणाम प्रिये,

निर्विकार सा खड़ा हूँ,किसकी सुनूं इस क्षण,

अपने हृदय की या फिर मस्तिष्क का ,

दोनों हैं अपने निर्णय पर अडिग प्रिये,

अपने सानिध्य से अवकाश प्रिये,

कितना क्षणभंगुर रहा अपना लम्बा साथ प्रिये,

अभी तो थी शुरुआत अभी देखो यह समाप्त प्रिये,

अपने सानिध्य से अवकाश प्रिये,

अवचेतन मन को यह आभास नहीं,

जो पास थे अब पास नहीं,

एक हवा का झोंका जैसे देता इस अस्तित्व का एहसास प्रिये,

अपने सानिध्य से अवकाश प्रिये,

अब तो केवल प्रतीक्षा है करना प्रिये

इस अवकाश के बाद पुनः अपना सानिध्य प्रिये।

आओ एक दुसरे के लिए शुभकामना करें ,

सुखमय और सफ़ल हो हम दोनों का अवकाश प्रिये।

गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

नव वर्ष की शुभकामना

प्राची की नव किरण,नव पुकार जगत का

नव -नव क्षितिज पर नव श्रृंगार समय का,


नव है जीवन की परिभाषा नव लहू यौवन का


रश्मिरथी बन कर आई है नव वर्ष जगत का ।


श्रृष्टि के हर अंश में हो , नव संचार सृजन का,


धरा के कण-कण में हो उन्माद हर कम्पन का


मानव के जीवन में हो हर पल अब सुख का

जीवन के उत्सव में हर क्षण अब आनंद का



















शनिवार, 18 दिसंबर 2010

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

बदलता बिहार

बिहार का रिजल्ट आ गया है .ख़ुशी का माहोल है ,कुछ घरों में छोड़ क़र.नितीश कुमार को लोगों नें एक बार फिर बिहार चलाने का जनादेश दिया है.पिछली बार सड़के बनी इस बार कारखाना बने और रोज़गार मिले इस उम्मीद में .सारे समीकरण ,चाहे वोह जाति के हों या अगड़े- पिछड़े का सब बेकार हो गये. बिहार को एक छोटी सी किरण विकास की दिखी और लोग उमड़ पड़े वोट देकर जिताने में।
सभी क्षेत्र में थोडा-थोडा विकास हुआ,आधारभूत संरचना,शिक्षा,कानून व्यवस्था और आर्थिक क्षेत्र में लेकिन बहुत दूर जाना है अभी.अगले पांच साल में इस सरकार को बहुत कर दिखाना है नहीं तो अगले चुनाव में सूपड़ा साफ़।
लालू न सामाजिक न्याय के नाम पर बिहार को गन्दा नाला बन कर छोड़ दिया था।
मुझे याद है किस तरह लालू की बेटी की शादी में पुरे पटना में दुकानों को लूटा गया.किस तरह साधू और सुभाष यादव पुरे राज्य में पैसा लूटने का कारोबार चला रहे थे.लोगों में आक्रोश था और नितीश जी ने कम से कम अपने आप को इस लूट तंत्र का हिस्सा नहीं बनने दिया है।
इन सब बातों का जिक्र इस ख़ुशी के माहोल में जरूरी नहीं केवल ये दुआ की बिहार सबसे अच्छे राज्यों में शुमार हो।

शुभकामना सारे बिहारवासियों को बिहार को अपना घर स्वीकारने वालों को.